21 June 2019

सरकार की काम चलाऊ नीतियों से नहीं इस प्रकार समाप्त होगा प्रदूषण का प्रकोप!

Posted By Navjyot Kaur  06 Mar 19 02:46 PM72628

सरकार की काम चलाऊ नीतियों से नहीं इस प्रकार समाप्त होगा प्रदूषण का प्रकोप!

नई दिल्ली :  आज प्रदूषण को लेकर पूरे विश्व में चर्चा है। हर तरफ सिर्फ चिंता है लेकिन समाधान होता कहीं नहीं दिख रहा है। प्रदूषण की रोकथाम के लिए कदम तो जोर-शोर से उठाए जाते हैं लेकिन वह सभी कदम सिर्फ कदम ही बनकर रह जाते हैं।


इस संबंध में राजधानी परिवहन पंचायत के अध्यक्ष इंद्रजीत सिंह अपने सुझाव देते हुए बताया कि लगभग 32 वर्षों से ज्यादा इसपर कार्य चल रहा है। विश्व स्तर पर हर देश के साथ-साथ भारत में भी हर मेट्रो सिटी में लगातार इस पर विचार विमर्श होता रहा है। इसी को लेकर इंद्रजीत सिंह ने कुछ समाधान देते हुए कहा कि  दिल्ली में सन 1998 से इसकी जो मुहिम चली उसके मुताबिक डीजल/पेट्रोल फ्यूल को सीएनजी में कन्वर्ट किया गया। उन्होंने बताया आज यह अध्ययन है कि दिल्ली की तमाम ऑटोरिक्शा पेट्रोल से चलती थी और दिल्ली की तमाम टैक्सी जो 1998 से पहले डीजल व पेट्रोल से चलती थी,  दिल्ली के तमाम लोडिंग व्हीकल जो पेट्रोल-डीजल से चलते थे उन सबको सीएनजी में परिवर्तित कर दिया गया। वहीं जब अध्ययन किया गया तो उस समय भी माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि जहां पर मानक भारत स्टेज एक था वहीं अब भारत 6 की बात चल रही है तो उस समय शायद प्रदूषण पर कुछ राहत मिल सकेगी जब भारत स्टेज 6 आ जाएगा। जहां एक तरफ गाड़ी मालिकों को तंग किया गया या अपनी स्वेछा से वाहन मालिकों ने अपनी गाड़ियां सीएनजी में परिवर्तित करवा लीं वहीं दूसरी तरफ आपको बता दें कि केंद्र व राज्य सरकार द्वारा पेट्रोल पम्पों पर कोई खास ध्यान नहीं दिया गया। 


लुब्रिकेंट दिल्ली की अगर बात करें तो दिल्ली में एक बहुत बड़ी मंडी है जहां पर नकली लुब्रिकेंट मिलते हैं। मिलावटी तेल पाया जाता है। इंद्रजीत सिंह का कहना है कि जहां पर लालबत्ती है या जाम है वहां पर प्रदूषण ज्यादा रहता है और इस संबंध में इंदरजीत सिंह ने बहुत से विभागों में आरटीआई के माध्यम से पूछा भी है कि दिल्ली के अंदर प्रदूषण का जो स्तर बढ़ा है वह कम नहीं हो रहा है। जब आरटीआई में इन सवालों का जवाब आया तो उसमें लिखा पाया गया कि प्रदूषण में 45 प्रतिशत कारण डस्ट है और मात्र 10 प्रतिशत सम्पूर्ण परिवहन का है। ऐसे में यह विचार करने का विषय है कि जिस प्रकार अगर कोई दवाई देता है और उसका परिणाम नहीं निकले तो दवाई बदलकर अन्य प्रयोग करने चाहिए इसी प्रकार यहां पर ऐसी कोई भी नीति केंद्र व राज्य सरकार द्वारा नहीं बनाई गई जिससे स्थिति में परिवर्तन कर सुधार हो सके। सरकार ऐसी कोई नीति क्यों नहीं बनाती आप महसूस करें अतिक्रमण जो भी रेहडी पटरी या दुकान के बाहर अतिक्रमण जब होगा तो आप देखेंगे कि वहां जाम लगने लगेगा तो वाहनों की स्पीड कम हो जाएगी और ज्यादा गाड़ी होने से प्रदूषण होने की सम्भावनाएं बढ़ जाती हैं। बात चल रही थी बीच वाली जो पटरी होती है जिसे डिवाइडर बोलते हैं आप महसूस करेंगे जो लोग सुबह तड़के निकलते हैं तो हमारे सफाई कर्मचारी सफाई करतें तो इससे जो भी डस्ट होती है उसे उठाकर पटरी के बीच में डाल देते हैं और साइड वाली को साइड में डाल देते हैं। आप महसूस करेंगे वह इतनी महीन हो जाते हैं कि जैसे ही बस या किसी भी वाहन के साइलेंसर या उनके गुजरने से वह उड़कर हमारे शरीर के भीतर पहुंच जाती है व वापस रोड़ पर आ जाती है। 


इस बारे में दिल्ली सरकार ने निर्णय लिया था कि जो डस्ट वाले स्थानों को वेक्यूम क्लिनर (ट्रक) से सफाई होगी। लेकिन यह गाड़ियां सिर्फ उन स्थानों पर देखी गई जहां पर इनकी आवश्यकता नहीं या फिर यह कहें की जहां पर डस्ट नहीं है। अब जिम्मेदारी किसकी बनती है ? क्या जो एजेंसियां हैं वह सिर्फ दोषी वाहन मालिकों को मानती है चाहे उसमें कमर्शियल वाहन मालिक हों चाहे प्राइवेट। एक आदेश पीछे माननीय कोर्ट का भी आया था जिसमें कहा गया था कि जो गाड़ियां चलती नहीं है उनको उठाया जाए पर सरकार ने इसके विपरीत गाड़ियों की लाइफ कम कर दी और 15 साल से पुरानी पेट्रोल गाड़ी और 10 साल से पुरानी डीजल गाड़ी को हटा दिया जाए यह समस्या का हल नहीं है। हमने कई जगहों पर यह महसूस किया है कि जब इंजन स्टार्ट होता तभी पोलूशन करता है जब बंद रहता है तो पोलूशन नहीं करता। हमारा यह कहना है कि गाड़ी की लाइफ कम ना करके आप फिटनेस रखें जिससे कि जो व्यक्ति या कोई कमर्शियल वाहन मालिक अगर अपनी गाड़ी से जीविका चला रहा है तो उससे उसकी जीविका ना छीनें। उसे आप यदि रोजगार नहीं दे सकते तो उसकी जीविका छीनने का अधिकार भी किसी सरकार के पास नहीं है। इसको अल्टरनेट यह है कि अगर आपक उससे गाड़ी छीनते हैं तो उसको अगली गाड़ी लेने में सब्सिडी या टैक्स में छूट दें या फिर वाहन का इंजन बदलकर नए मानक का इंजन वाहनों में लगाकर उसे प्रदूषण ना फैलाने के योग्य बनाया जा सकता है सरकार के अनुसार। 

आज यह सोचने का विषय है अगर हम लाल बत्ति खत्म कर दें, रेहडी पटरी को रोड़ से हटाकर पीछे कर दे, पार्किंग की व्यवस्था को सुनिश्चित कर दें तो आप महसूस करेंगे कि प्रदूषण का स्तर कम हो जाएगा। यहां पर बात आती है कि दिल्ली नगर निगम ने अपनी जो कूड़ा उठाने की गाड़ियां हैं वह गाड़ियां बिना ढके रोड़ पर चलती हैं जिससे रोड़ पर कुड़ा गिरता है और डस्ट की स्थिति बनी रहती है। आप लोग महसूस करेंगे अगर बीपी की दवाई की छोटी सी गोली होती हो तो इतने बड़े शरीर को आराम कर देती हैं एक धूल का एक भी कण आपको बीमार करने के लिए काफी है।

दिल्ली में तमाम ऐसी कॉलोनियां और बाजार है जहां पर सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है। आज दिल्ली के अंदर अगर आप प्रदूषण कम करना चाहते हैं तो आप लोग जितने भी शॉपिंग कॉंम्पलेक्स हैं, मार्केट हैं या बाजार हैं वहां पर प्राइवेट गाड़ी को आप लोग पार्किंग चार्ज को 200 रूपए प्रति घंटा कर दीजिए आप लोग महसूस करेंगे कि गाड़ियों की संख्या जब रोड पर कम रहती है तो वहां पर आपके शहर का प्रदूषण लेवल भी कम रहता है। अब यदि सवाल यह हो कि यदि गाड़ियां नहीं लेकर जाएंगे तो कैसे जाएंगे, तो आपको बता दें कि आज दिल्ली सरकार ने यह व्यवस्था कर दी है कि हर मैट्रो से बैटरी रिक्शा या ऑटो या टैक्सी की सुविधा मौजूद है इसके साथ-साथ दिल्ली परिवहन निगम की एसी व नॉन एसी बसें भी हैं। 

लाजपत नगर मार्केट में हाईकोर्ट के आदेशानुसार सारा अतिक्रमण हटा दिया गया है। आप लोग महसूस करेंगे कि जब आप बाजार जाते हैं तो आपके साथ कोई आदमी नहीं टकराता और न ही आपकी जेब कटती हैं, आपको शॉपिंग करने में दिक्कत नहीं आती है यह एक रोल मॉडल है कि यदि अतिक्रमण न हो तो कितना बदलाव आ सकता है। अब जरूरत है भ्रष्टाचार को मिटाने की। अतिक्रमण के नाम पर जो सहायक अधिकारी हैं चाहे वह एमसीडी के अधिकारी हों या जो भी उनसे संबंधित होगा उनको सुविधा शुल्क ना दें या वह ना लें तो अतिक्रमण नाम की बीमारी खत्म हो सकती है। स्वच्छ हवा सभी दिल्लीवाले चाहते हैं जिससे हमारा स्वास्थ्य ठीक रहे उसके लिए सबको आवश्यकता है कि वह इस चीज की ओर थोड़ा ध्यान दें कि अगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट आप इस्तेमाल करेंगे तो उसकी कमियों को आप बताएंगे तो सरकार पब्लिक ट्रांसपोर्ट की तरफ ज्यादा ध्यान देगी चाहे वह मेट्रो, एसी बस, ऑटो टैक्सी हो। दूसरी तरफ इस तरह की व्यवस्था कराई जाए जिससे लोडिंग के जो टेंपो चलते हैं जिनको छोटा हाथी बोलते हैं अगर उसकी जगह यदि एक बड़ा वाहन वहां आ जाएगा तो सब गाड़ी का सामान एक जगह ले जाया जा सकेगा। जहां 50 गाड़ियां जाएगी वहां इस एक वाहन से आराम से माल डिलीवर किया जा सकेगा। 

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